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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 66, Verse 17

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 66, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 66 · श्लोक 17

संस्कृत श्लोक

महादरीषु देहाद्रेस्तृष्णाकण्टकितास्वपि । फलव्यालासु च पुनः क्रियासु परिलुठ्यते ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि दैवात्‌ मरण के बाद फिर मनुष्य का शरीर मिला, उसमें भी अत्यन्त दुर्लभ ब्राह्मण आदि का शरीर मिले, तो भी वर्तमान शरीर के मिलने पर केवल विषयासक्ति के कारण हो रहा भ्रमण जैसे दुर्वार है, वैसे ही उसमें भी भ्रमण दुर्वार ही होगा, इस आशय से कहते हैं। फल ही विषयोपभोग ही जिनमें भयंकर सर्प रहते हैं, हजारों विषयोपभोगों की तृष्णाएँ ही जिनमें उत्पन्न कटि भी हैं, ऐसी देहरूपी पर्वत की महान्‌ भीषण गुफाओं में यानी गुफाओं के सदृश देहस्थ छिद्रों में अवस्थित इन्द्रियों की आसक्तियों में तथा ऐहिक एवं पारलौकिक भोगों की हेतुभूत लौकिक और वैदिक क्रियाओं में ही जीव सदा सर्वदा लुढ़कता रहता है, अतः उनमें भी आत्मा और अनात्मा के विवेक की संभावना नहीं है, यह भाव है