Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 66, Verse 38
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 66, verse 38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 66 · श्लोक 38
संस्कृत श्लोक
अनात्मीयानि दुःखानि बहून्येवंविधान्ययम् ।
आत्मबुद्ध्या विचिन्वानो जनो गच्छति दीनताम् ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, चिरकालिक चिन्ता नदी के समान् आवर्त में, जिसमें तरंग के समूह भरे पड़े हैं, अत्यन्त
चपल मनरूपी मत्स्य क्षण भर में ही महती वृद्धि को प्राप्त हो जाता है ॥ ३ ७॥ आत्मा का तनिक भी स्पर्शं
नहीं करनेवाले तथा अनात्मभूत देह आदि की ही शरण लेनेवाले उस प्रकार के असंख्य दुःखों को
देहात्मबुद्धि से बटोरकर पुरुष दीनता को प्राप्त करता हे