Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 66, Verse 14
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 66, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 66 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
शैशवाङ्कुरितोज्जृम्भान्नवयौवनपल्लवः ।
जराकुसुमितोऽभ्येति पुनः संसारदुर्द्रुमः ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रिय मित्र, यह संसाररूपी दुष्ट वृक्ष जो पहलें अंकुरित होने पर शैशवरूप विकार टहनीरूपी विकास
को पाता है, तदनन्तर उसका अतिक्रमण कर यौवनरूपी पत्ते धारण करता है और तदनन्तर जरारूपी
कुसुम से कुसुमित होता है वह बार-बार प्राप्त होता ही रहता है