Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 58
सत्तावनवाँ सर्ग समाप्त अद्भावनर्वं सर्ग किरात देश के सुरघु के वैराम्य का वर्णन तथा उसके प्रति मांडव्य का उपदेश ।
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- Verse 1) श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, पहले के मुनि इसी विषय में यानी शब्दरूपा भेददृष्टि केवल…
- Verses 2–4सुरघु के निवास देश को बतलाने के लिए उसके पास के हिमालय के शिखर का वर्णन करते है । यहाँ हि…
- Verse 5दिव्यांगनाएँ जिस पर आरूढ है, ऐसे अतिचंचल रत्नों की शलाकाओं से युक्त रुद्राक्ष वृक्षों में…
- Verse 6जहाँ प्रमत्त प्रमथगणों की अंगनाओं के चरणों से विताडित विलासी शोकरहित पुरष ऐसे भले लगते है…
- Verse 7उस शिखर पर जिन- जिन दिशाओं मे भगवान् शंकर का विचरण होता है उन-उन दिशाओं में (मस्तक में ध…
- Verse 8ओर भूतो का आधार है अथवा उन लता आदियों से वह समस्त ब्रह्माण्ड की तरह आच्छादित है
- Verse 9उस हिमालय के शिखरभूत कैलास के मूल देश में हेमजट (सुवर्णं के सदुश पीत जटावाले) नाम के किरा…
- Verse 10कैलास पर्वत के नीचे पर्वतो के अरण्यों में उत्पन्न होनेवाले रुद्राक्ष ओर अन्यान्य वृक्षों…
- Verses 11–13उन किरातो का एक राजा था, वह उदारचेता ओर शत्रुओं के दुर्गो का जीतनेवाला था, विजयलक्ष्मी तो…
- Verse 14जेस सहस्रांशु दिवाकर (सूर्य) किसी प्रकार की अंगों में थकावट का अनुभव किये बिना क्रमशः एक…
- Verse 15अनन्तर निग्रहानुग्रह-व्यवस्था से किये जानेवाले उन राजकार्यो से उत्पन्न सुख ओर दुःखों के क…
- Verse 16दुःख से जनित चिन्ता और शोक को दिखलाते हैं। कोल्हूयन्त्र में जैसे तिल पीसे जाते हैं, वैसे…
- Verse 17कर्तव्य के संशय में प्रथम कोटि को दिखलाते हैं। इसलिए इन दुःखीजनों को मैं धन दूँ, इनके ऊपर…
- Verse 18अब दूसरी कोटि बतलाते हैं। अथवा धर्मशास्त्र ने जिस पुरुष के लिए जैसा निग्रह यानी वध, बन्धन…
- Verse 19वध ओर बन्धन आदि से यह मेरा दण्डनीय है, यह पुरस्कार आदि से सदा अनुकम्पनीय है, भाग्यवश आज स…
- Verse 20जैसे सोये हुए प्यासे पुरुष का बहुत काल की तृष्णा से युक्त मन जल के बड़े बड़े आवर्तों में…
- Verse 21किसी एक समय जैसे देवर्षि नारद इन्द्र के घर आते हैं वैसे ही जिन्होंने समस्त दिशारूपी मण्डल…
- Verse 22इस राजा ने सम्पूर्ण शास्त्रों के विज्ञाता, सन्देहरूपी दुष्ट वृक्ष-स्तम्भ के छेदन में कुठा…
- Verse 23सुरघुने कहा : हे महामुने, जैसे भूमि पर वसन्त ऋतु के अथवा विष्णु के आने पर लोक परम सुखी हो…
- Verse 24भगवान्, आज मैंने पुण्यवान् जनों में धर्मतः प्रथम स्थान प्राप्त किया, क्योंकि कमल को विक…
- Verse 25सम्पूर्ण धर्मों के जाननेवाले हे भगवान्, आप परम पद में चिरकाल से ही विश्रान्ति पा चुके है…
- Verse 26महाराज बड़ों के संसर्ग से भला किसको दुःख से छुटकारा नहीं होता ? दुःख के स्वरूप को भली-भाँ…
- Verse 27जैसे सिंह के नख हाथी को उत्पीडित करते हैं, वैसे ही मेरे शत्रु, मित्र आदि के शरीरों के विष…
- Verse 28हे भगवान्, इसलिए सूर्य की किरणों के समान मेरी बुद्धि में सर्वदा सम दृष्टि का उदय जैसे हो…
- Verse 29माण्डव्य ने कहा : राजन, जैसे (धूप से) कुहरा नष्ट हो जाता है, वैसे ही वैराग्य, त्याग आदि स…
- Verse 30हे राजन्, जैसे शरत्-काल के आगमन मात्र से बड़े-बड़े मेघमण्डल विलीन हो जाते हैं, वैसे ही…
- Verses 31–32हे राजन्, अपने ही मन से भीतर विचार कीजिये कि जो अपने सम्बन्धी शत्रु, मित्र आदि, अपने शरी…
- Verse 33मैं कौन हूँ ? कैसा हू ?, यह दिखाई देनेवाला जगत् क्या है? कैसे जन्म ओर मरण होते है ?, इसक…
- Verse 34जैसे तरंग अपने उत्तंग स्वरूप को छोड पूर्वसिद्ध जलस्वभाव होकर शान्त हो जाता हे, वैसे ही चि…
- Verses 35–38तब क्या मन की सत्ता ही विनष्ट हो जायेगी ? नहीं, ऐसा कहते है। जैसे पहले मनु के बाद कलिकाल…
- Verse 39केवल दुःखनिवृत्ति ही तत्त्वज्ञान का फल नहीं है, किन्तु जिस साम्राज्य में ब्रह्मा आदि देवत…
- Verse 40केवल दृश्य का अवलम्बन करनेवाली अन्तःकरण की वासनारूपी उक्त अपनी दीनता से कीड़े की भाँति आप…
- Verse 41तब किन किन विषयो में या कितने समय तक वैराग्य करना चाहिए ? ऐसी शंका होने पर कहते हैं । हे…
- Verse 42अनेक तरह की श्रुतियो और शास्त्रों का पयालोचन करना चाहिए । अनेक तरह की श्रुतियों और शास्त्…
- Verse 43सर्वात्मक बुद्धि से सर्वदा सभी प्रकारो से सब देशों मे सभी दृश्यों का परित्याग कर पूर्णात्…
- Verse 44कहे गये ही अर्थ को व्यतिरेक से भी दढ करते हैं। जब तक सम्पूर्ण दृश्यों का परित्याग नहीं हो…
- Verse 45साधो, व्यवहार में भी जब तक विरोधी वस्तु को नहीं छोड़ते तब तक सामान्य गाय, धन आदि वस्तु भी…
- Verse 46राजन्, अन्यान्य सब कार्यो को छोडकर जिस विषय की प्राप्ति के लिए आत्मा स्वयं सब प्रकार से…
- Verse 47इससे आत्मा का साक्षात्कार करने के लिए सभी विषयों का परित्याग करना चाहिए सबका परित्याग करन…
- Verse 48मणियों में सूत की नाई सम्पूर्ण कार्य और कारणों की परम्परारूप जगत् में अनुगत सद्रूप वस्तु…