Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 58, Verses 31–32
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 58, verses 31–32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 58 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
स्वेनैव मनसा स्वानि स्वशरीरगतानि च ।
विचारयेन्द्रियाण्यन्तः कीदृशान्यथ कानि च ॥ ३१ ॥
कोऽहं कथमिदं किंवा कथं मरणजन्मनी ।
विचारयान्तरेवं त्वं महत्तामलमेष्यसि ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
हे राजन्, अपने ही मन से भीतर विचार कीजिये कि जो अपने
सम्बन्धी शत्रु, मित्र आदि, अपने शरीर में रहनेवाली इन्द्र्यो तथा बुद्धि आदि वस्तुएँ है, वे तत्त्वतः कौन
है एवं युक्ति से उनका प्रकार क्या है ?