Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 58, Verse 34
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 58, verse 34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 58 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
मनः कृष्णमृत्सृज्य शममेष्यति विज्वरम् ।
भूतपूर्ववपुर्भूत्वा तरङ्गः पयसीव ते ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे तरंग अपने उत्तंग स्वरूप को छोड पूर्वसिद्ध
जलस्वभाव होकर शान्त हो जाता हे, वैसे ही चिन्ताज्वर से मुक्त हुआ आपका मन अपने संकल्प
विकल्पात्मक स्वरूप को छोड पूर्वसिद्ध ब्रह्मस्वभाव हो कर शान्ति को, निर्विक्षेपता को प्राप्त हो
जायेगा