Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 58, Verses 11–13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 58, verses 11–13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 58 · श्लोक 11-13
संस्कृत श्लोक
आसीत्तेषामुदारात्मा राजा परपुरंजयः ।
जयलक्ष्म्या भुज इव यः प्रजायाश्च दक्षिणः ॥ ११ ॥
सुरघुर्नाम बलवान्सुरघोरारिदर्पहा ।
अर्कः पराक्रम इव मूर्तिमानिव मारुतः ॥ १२ ॥
जितो वै राज्यविभवैर्धनैर्गुह्यकनायकः ।
शतक्रतुगुरुर्बोधैः काव्यैरसुरदेशिकः ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
उन किरातो का एक राजा था, वह उदारचेता ओर शत्रुओं के दुर्गो का जीतनेवाला
था, विजयलक्ष्मी तो मानों उसके हाथ थी । प्रजा के पालन में दक्ष था, उसका नाम था-सुरघु, वह
अत्यन्त बली था, बड़े-बड़े शत्रुओं के दर्पं को देवों के समान मिनट भर में विचूर्णित कर देता था,
पराक्रम में वह सूर्य के सदृश था, गति में शरीरधारी वायु के तुल्य था। अपने अनेकविध राज्य वैभवों से
तथा विविध धन संपत्तियों से उसने गुह्यकं के नायक कुबेर को मात कर दिया था । उच्च आत्मज्ञान के
कारण सूराधीश इन्दर के गुरु वृहस्पति के ओर रस, अलंकार आदि से परिपूर्ण काव्यो की विविध रचनाओं
के कारण असुर देश के शुक्राचार्य के ऊपर उसने विजय पा रक्खी थी