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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 58, Verse 46

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 58, verse 46 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 58 · श्लोक 46

संस्कृत श्लोक

यत्र सर्वात्मनैवात्मा लाभाय यतति स्वयम् । त्यक्तान्यकार्यं प्राप्नोति तन्नाम नृप नेतरत् ॥ ४६ ॥

हिन्दी अर्थ

राजन्‌, अन्यान्य सब कार्यो को छोडकर जिस विषय की प्राप्ति के लिए आत्मा स्वयं सब प्रकार से प्रयत्न करता है, उसी को प्राप्त करता है, दूसरे को नहीं