Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 58, Verse 42
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 58, verse 42 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 58 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
तावत्प्रक्षाल्यते धातुर्यावद्धेमैव शिष्यते ।
तावदालोक्यते सर्वं यावदात्मैव लभ्यते ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
अनेक तरह की श्रुतियो और शास्त्रों का पयालोचन करना चाहिए । अनेक तरह की श्रुतियों और
शास्त्रों का पर्यालोचन भी तव तक करना चाहिए, जब तक कि आत्मा का अपरोक्ष साक्षात्कार न हो,
ऐसा कहते है ।
जैसे जिस धातु में सुवर्ण का अस्तित्व है, उस धातु का तब तक शोधन किया जाता है, जब तक
केवल सुवर्ण अवशिष्ट नहीं रह जाता, वैसे ही तब तक समस्त अध्यात्म आदि शास्त्र देखे (विचारे)
जाते हैं, जब तक कि केवल आत्मा प्राप्त नहीं हो जाता हे