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Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 46

पैंतालीसवाँ सर्ग समाप्त छियालीसवाँ सर्ग उसे दूसरे चाण्डाल से चाण्डाल जानकर लोगों के अग्नि में प्रवेश करने पर उसका भी अग्नि में भस्म होना और गाधि का प्रबुद्ध होना ।

29 verse-groups

  1. Verses 1–3श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, वह विलासवती सुन्दरियों से परिवृत मन्त्रिमण्डल द…
  2. Verse 4कीरदेश में उस चाण्डाल ने आठ वर्ष तक राज्य किया | तब तक उसने दया, दाक्षिण्य, शौचादि सद्वृत…
  3. Verse 5तदनन्तर एक समय वह अपनी इच्छा से भूषणरहित अतएव अन्धकार सा तारे चन्द्रमा, सूर्य के तेज ओर म…
  4. Verse 6वह हार, बाजूबन्द कड़े आदि आभूषणों का बहुत आदर न करता था क्योकि प्रभुता से परिपूर्ण चित्त…
  5. Verses 7–8जैसे अस्त को प्राप्त होता हुआ सूर्य मुख्य आकाशरूपी आँगन से आकाश के अन्तिम भाग को जाता हे…
  6. Verse 9वह जैसे भ्रमर पंक्ति, जिसके पंख शब्द कर रहे हों, वृक्ष को कम्पित करती हे वैसे ही करपल्लव…
  7. Verse 10उनमें से एक बूढ़ा चाण्डालो का नेता उठा जिसके लालनेत्र थे ओर जो हिमसे आच्छन्न पर्वत के काँ…
  8. Verses 11–16उसने "कटंज' इस पूर्वनाम से कीर देश के अधिपति गवल का सहज संबोधन करते हुए कहा : जैसे श्रृंग…
  9. Verse 17जैसे तुषार से भरनेवाली वृष्टि से कमल शोभित नहीं होते और जैसे उत्पातों से युक्त ग्राम शोभि…
  10. Verse 18जैसे वृक्ष की चोटी पर बैठी हुई बिल्ली के फुफकार का सिंह तिरस्कार करता है वैसे ही राजा ने…
  11. Verse 19उसने तुरन्त जैसे राजहंस अनावृष्टि से जिसके कमल म्लान हो रहे हों ऐसे तालाब में प्रवेश करता…
  12. Verse 20जिसके तने के बड़े खोखले में अग्नि लगी हो ऐसे सेमल आदि का वृक्ष जैसे म्लानता को प्राप्त हो…
  13. Verse 21वहाँ पर चूहे ने जिसकी जड़ खा डाली हो ऐसे कुंकुम के फूलों की झाड़ी के समान सब लोगों को उसन…
  14. Verses 22–23तदनन्तर उन मन्त्री, नगरवासी और नारियों ने जैसे घर में ही स्थित शव का लोग स्पर्श नहीं करते…
  15. Verse 24जैसे दुःखी अत्यन्त स्नेहवाली ललनाएँ शव का दूर से ही त्यागकर देती हैं ऐसे ही सेवकों ने असत…
  16. Verse 25उसका शरीर धुएँ के समान मैला था। जैसे पर्वत के शिलामय प्रदेश के समीप अग्नि नहीं जाती वैसे…
  17. Verse 26अपनी आज्ञाशक्ति से उसने जनता को क्यो वशीभूत नहीं किया ? ऐसी शंका होने पर कहते हैं। योद्धा…
  18. Verse 27जैसे लोग राक्षस से भयभीत होकर भागते हैं वैसे ही क्रूर कार्यकारी आकारवाले तथा संगति से अशु…
  19. Verse 28यद्यपि वह बहुत से लोगों के बीच में रहता था तथापि जैसे परदेश में धन आदि गुणों से रहित पथिक…
  20. Verse 29जैसे पथिक वायु के कारण शब्द कर रहे तथा मोतियों की राशि से युक्त भी कीचकनाम के विशेष बाँसो…
  21. Verses 30–31इसके अनन्तर हम सब लोग चिरकाल तक चाण्डाल के स्पर्श से दूषित हैं, प्रायश्चितं से हमारी शुद्…
  22. Verses 32–33तब आकाश में तारों के समान चारों ओर उसमें चिताओं के प्रज्वलित होने पर सारे नगर के लोग विला…
  23. Verses 34–36था
  24. Verses 37–38चिताओं में जले हुए श्रेष्ठ ब्राह्मणों के मांस से अधिक गन्धवाली उत्पात की आँधी द्वारा मिट्…
  25. Verse 39वहाँ पर उन्मत्त चोर लुटेरों द्वारा आभूषण आदि के हरण के समय बालक और कुमार रो और काँप रहे थ…
  26. Verses 40–43इस प्रकार इस कष्ट पर विधिविपर्यय के, जिससे सारी जनता की पूर्ण प्रलय के समान स्थिति थी, प्…
  27. Verse 44ऐसा विचार कर गवल ने अपने शरीर को पतंग की नाई बिना किसी उद्वेग के प्रज्वलित अग्नि में आहुत…
  28. Verse 45गवल नामक उस देह के निर्वेदवश अग्नि में गिरने और अवयवों से व्याकुल होने पर अपने अंगों के द…
  29. Verse 46श्रीवाल्मीकिजी ने कहा : मुनि महाराज के ऐसा कहने पर दिन बीत गया, सूर्य भगवान्‌ अस्ताचलावलम…