Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 46, Verses 40–43
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 46, verses 40–43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 46 · श्लोक 40-43
संस्कृत श्लोक
तस्मिंस्तथा वर्तमाने कष्टे विधिविपर्यये ।
अशेषजनताशेषकल्पान्तसदृशस्थितौ ॥ ४० ॥
राज्यसज्जनसंपर्कपवित्रीकृतधीरधीः ।
गवलश्चिन्तयामास शोकेनाकुलचेतनः ॥ ४१ ॥
मदर्थे हि कदर्थोऽयं देशेऽस्मिन्स्थितिमागतः ।
अकालकल्पान्तमयः सर्वनायकनाशनः ॥ ४२ ॥
किं मे जीवितदुःखेन मरणं मे महोत्सवः ।
लोकनिन्द्यस्य दुर्जन्तोर्जीवितान्मरणं वरम् ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार इस कष्ट पर विधिविपर्यय के, जिससे सारी
जनता की पूर्ण प्रलय के समान स्थिति थी, प्रवृत्त होने पर शोक से व्याकुल चित्तवाले गवलने, राज्य के
सज्जनों के संसर्ग से जिसकी धीर बुद्धि पवित्र हो गई थी, विचार किया । मेरे ही कारण यह अनर्थ, जो
अकाल प्रलयमय और सब नेताओं का नाशकारी है, इस देश में उत्पन्न हुआ है। मेरे जीवन के क्लेश से
क्या प्रयोजन है मेरे लिए मरना ही महोत्सव है । लोकनिन्दनीय दुष्ट जीव का जीवन की अपेक्षा मरण
अच्छा है