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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 46, Verses 7–8

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 46, verses 7–8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 46 · श्लोक 7, 8

संस्कृत श्लोक

एक एवाजिरं बाह्यं तादृग्वेषः स निर्ययौ । मुख्याङ्गं णान्नभोभागादस्तं गच्छन्निवांशुमान् ॥ ७ ॥ तत्रापश्यद्धनं श्यामं पीनं श्वपचपेटकम् । गायन्मृदु वसन्तोत्थं कोकिलानामिव व्रजम् ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे अस्त को प्राप्त होता हुआ सूर्य मुख्य आकाशरूपी आँगन से आकाश के अन्तिम भाग को जाता हे वैसे ही वह मुख्यजनों से आश्रित भीतर के आँगन से साधारण लोगों से सेवित बाहरी आँगन में पूर्वोक्त वेष से अकेला ही गया । वहाँ पर उसने वसन्त मेँ उत्पन्न हुए कोकिलो के समूह की नाई मधुर गा रहे काले ओर स्थूलदेहवाले चाण्डालो के संघ को देखा