Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 46, Verses 1–3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 46, verses 1–3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 46 · श्लोक 1-3
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
विलासिनीभिर्वलितो मन्त्रिमण्डलपूजितः ।
वन्दितः सर्वसामन्तैश्छत्रचामरलालितः ॥ १ ॥
सिद्धानुशासनः कान्तो ज्ञातराज्यगुणक्रमः ।
वीतशोकभयायासप्रज्ञः प्राप्तमहादशः ॥ २ ॥
विस्मृतात्मस्वभावोऽभूदनिशं स्तवमङ्गलैः ।
आनन्दपूर्णया वृत्त्या भृशं क्षीव इवासवैः ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, वह विलासवती सुन्दरियों से परिवृत मन्त्रिमण्डल द्वारा
सन्मानित, सब सामन्तो द्वारा वन्दित, छत्र ओर चँवरों से लालित अप्रतिहत आज्ञावाला तथा सुन्दर
आकृतिवाला था उसे राज्य के सब गुण ज्ञात थे। उसकी प्रजाओं के शोक, भय, क्लेशआदि नष्ट हो
गये थे । निरन्तर स्तुतिमंगल और आनन्दपूर्ण वृत्ति से, आसवों से अत्यन्त उन्मत्त हुए पुरुष की नाई,
वह अपने स्वभाव को भूल गया
सर्ग सन्दर्भ
पैंतालीसवाँ सर्ग समाप्त छियालीसवाँ सर्ग उसे दूसरे चाण्डाल से चाण्डाल जानकर लोगों के अग्नि में प्रवेश करने पर उसका भी अग्नि में भस्म होना और गाधि का प्रबुद्ध होना ।