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Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 41

30 verse-groups

  1. Verses 1–2कारण जगद्रूप रत्नों के सन्दूकरूप ओर सृष्टिकाल में त्रलोक्यरूपी अद्भुत पदार्थ का दर्शन करन…
  2. Verses 3–4प्रह्लाद ने कहा : भगवान्‌, असुरो का क्या हित है और देवताओं का क्या अहित है, इस विचार से औ…
  3. Verse 5हे देवाधिदेव, आपके प्रसाद से तत्त्वबोध द्वारा स्वरूपावस्थिति मुझे भली-भाँति प्राप्त हो गई…
  4. Verses 6–7हे महेश्वर, मैं सब संकल्पो से निर्मुक्त इस अनन्त अन्तर दृष्टि मे निर्मल आकाश मेँ आकाश की…
  5. Verse 8यदि कहें कि पिता के राज्य आदि के नाश आदि शोक के हेतु तो तुमने देखे ही है, उनका अपलाप कैसे…
  6. Verse 9तब तुम्हारी समाधि का हेतु क्या है ? ऐसा यदि प्रश्न हो तो विचार से उत्पन्न विश्रान्ति की इ…
  7. Verse 10यदि कोई कहे “न च वैराग्यचिन्तया“ इस अंश से वैराग्य का निराकारण उचित नहीं है, क्योकि विचार…
  8. Verse 11वैराग्य के समाधिकारण होने पर रागयुक्त देह में भी दुःख हेतुत्व का अनुभव होगा, अतः उसका त्य…
  9. Verse 12इसलिए सुख प्राप्ति की इच्छा से अथवा दुःखनिवृत्ति की इच्छा से मैंने समाधि नहीं ली, ऐसा कहत…
  10. Verse 13तब भेदवासना के क्षय की इच्छा से तुमने समाधि ली होगी, ऐसा यदि कोई कहे, तो उस पर कहते हैं ।…
  11. Verse 14संसार के त्याग के लिए अथवा मोक्ष की प्राप्ति के लिए तुमने समाधि ली होगी, ऐसा यदि कहें, तो…
  12. Verse 15हे कमलनयन, सब में आत्मरूप आपके व्याप्त होने पर हेयोपादेय पक्ष में स्थित दूसरी कल्पना कहाँ…
  13. Verse 16भ्रान्तिज्ञान में सीप में रजत के समान भासित होनेवाले परमार्थरूप से भासित न होनेवाला यह सा…
  14. Verse 17इसलिए मेरी तत्त्व विचार विश्रान्ति ही समाधि हो गई, ऐसा कहते हैं । अपने स्वभाव से केवल द्र…
  15. Verse 18समाधिकाल में में इष्ट ओर अनिष्ट (प्रिय ओर अप्रिय) से रहित हेयोपादेय से विहीन था । इस समय…
  16. Verse 19वह अपने स्वभाव को प्राप्त हुआ मैं मेरे द्वारा स्वकर्तव्यता से प्राप्त किये गये आपसे आज्ञप…
  17. Verse 20जैसे आपके द्वारा आज्ञप्त राज्य को, जो मुझे स्वभावतः प्राप्त है, मैं स्वीकार करता हूँ वैसे…
  18. Verse 21ऐसा कहकर दानवराज प्रह्लाद ने क्षीरोदशायी भगवान्‌ के आगे शैलराज जैसे पूर्ण चन्द्रमा को उपस…
  19. Verses 22–23प्रह्लाद ने अपने शंख, चक्र आदि आयुधों से युक्त, अप्सराओं द्वारा परिवेष्टित, देवताओं से पर…
  20. Verse 24हे दानवराज उठो, सिंहासन पर बैठो, मैं स्वयं अपने हाथों से शीघ्र तुम्हारा राज्याभिषेक करता…
  21. Verses 25–26पौचजन्य शंख की ध्वनि सुनकर जो ये सिद्ध, साध्य ओर देववृन्द आये हैं वे तुम्हारा मंगल करे |…
  22. Verses 27–30के जलों से, सब विप्र ऋषियों ओर सब सिद्धगणों के साथ असुरराज प्रह्लाद का दैत्यराज्य में ऐसे…
  23. Verse 31सुर ओर असुरो से स्तूयमान भगवान्‌ श्रीहरि ने राज्य में अभिषिक्त, सुर ओर असुरो से प्रह्नाद…
  24. Verse 32अनुराग, भय और क्रोध से रहित तुम, इष्ट ओर अनिष्ट फल का त्यागकर समबुद्धि से राज्य का पालन क…
  25. Verse 33तुम निरतिशयानन्द भूमि देख चुके हो, अतएव तुम्हें सब भोगों से परिपूर्ण राज्य में अरतिरूप उद…
  26. Verses 34–35प्रजा, शत्रु आदि के ऊपर निग्रह, अनुग्रह आदि ? यथा प्राप्त दृष्टियों मे तत्‌-तत्‌ पुरुषों…
  27. Verses 36–37तुम संसार के व्यवहार को देख चुके हो, अनुपम उस परम पद का भी तुम्हे अनुभव हो चुका है, इसलिए…
  28. Verse 38अनुराग, भय ओर क्रोध से रहित तुम्हारे राजा होने पर अब असुरो में दुःख रूपी दुर्ग्रन्थि नहीं…
  29. Verses 39–40आज से लेकर देव-दानवों के युद्ध से वंचित जगत्‌ स्पन्दरहित सागर के समान स्वस्थ-सा हो जायेगा…
  30. Verse 41हे दानव, तुम कृष्णपक्ष की रात्रियों मे गाढ़ निद्रा ओर अन्धकाररूप अज्ञानान्धकार को दूर कर…