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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 41, Verses 36–37

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 41, verses 36–37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 41 · श्लोक 36

संस्कृत श्लोक

दृष्टसंसारपर्यायस्तुलिनातुलतत्पदः । सर्वं सर्वत्र जानासि किमन्यदुपदिश्यते ॥ ३६ ॥ वीतरागभयक्रोधे त्वयि राजनि राजति । नेदानीं दुःखदुर्ग्रन्थिर्नासुरान्दलयिष्यति ॥ ३७ ॥

हिन्दी अर्थ

तुम संसार के व्यवहार को देख चुके हो, अनुपम उस परम पद का भी तुम्हे अनुभव हो चुका है, इसलिए सर्वत्र सब कुछ तुम जानते हो । तुम्हारे लिए अधिक क्या उपदेश किया जाय ? अर्थात्‌ व्यवहार और परमार्थमें तुम कुशल हो तुम्हारे लिए उपदेश की आवश्यकता नहीं है