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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 41, Verses 34–35

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 41, verses 34–35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 41 · श्लोक 34,35

संस्कृत श्लोक

देशकालक्रियाकारैर्यथाप्राप्तासु दृष्टिषु । प्रकृतं कार्यमातिष्ठ त्यक्त्वा मानसमास्स्व भो ॥ ३४ ॥ अतिदेहतयेदंताममतापरिवर्जितम् । भावाभावे समं कार्यं कुर्वन्निह न बाध्यसे ॥ ३५ ॥

हिन्दी अर्थ

प्रजा, शत्रु आदि के ऊपर निग्रह, अनुग्रह आदि ? यथा प्राप्त दृष्टियों मे तत्‌-तत्‌ पुरुषों के अनुरूप देश, काल और क्रिया से अपने ऊपर प्राप्त वध, बंधन आदि कार्य करो । राग, द्वेष आदि विषमता का त्यागकर रहो । देह से अतिरिक्त आत्मा ही इस भाव से लाभ ओर हानि में समानरूप से इदन्ता और ममता से वर्जित कार्य कर रहे तुम सुख-दुखों से पीडित नहीं होगे