Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 14
तेरहवाँ सर्ग समाप्त चौदहवाँ सर्ग विविध योनियों में दुःख पा रहे, उपदेश के अयोग्य लोगों की उपेक्षा कर उपदेश के योग्य लोगों के लिए मन के मार्जन के उपाय का वर्णन ।
38 verse-groups
- Verses 1–2मन एवाऽसदुत्थितम्। यःशक्तो न वशीकर्तु नाऽसौ रामोपदिश्यते। इस प्रकार पहले प्रस्तुत उपदेश…
- Verse 3नेत्र के रहने पर भी जो दूरदृष्ट को, द्वेष आदि से सदा नहीं देखता, कौन दुर्मति पुरुष उसे वि…
- Verse 4कौन दुर्बुद्धि पुरुष कुष्ठरोग से छिन्न-भिन्न, घर्घर शब्द करनेवाली नासिका से युक्त पुरुष क…
- Verse 5कोन अबुद्धिपुरुष मदिरा के नशे से जिसकी आखें चदी हो, अतएव जिसकी इन्द्र्यो अपना कार्य करने…
- Verse 6कौन पुरुष श्मशान में पड़े हुए शव से सन्देह होने पर जन-समूहों की सैकड़ों कथाएँ पूछेगा वैसे…
- Verse 7जो हृदयरूपी बिल मेँ स्थित मनरूपी गूंगे और अन्धे साँप को नहीं जीत सका, उस दुर्बुद्धि को कि…
- Verse 8वस्तुतः जो है ही नहीं, उस मन को आप जीता हुआ ही जानिये । जो शिला है ही नहीं, वह अपने निकट…
- Verse 9जिस दुर्बुद्धि पुरुष ने अविद्यमान मन पर विजय प्राप्त नहीं की, वह विष खाये बिना ही विष की…
- Verse 10"वस्तुतो यन्न विद्यते“ एसा जो पहले कहा, उसकी उपपत्ति कहते है । ज्ञानी आत्मा सदा ही देखता…
- Verse 11यदि कोई कहे सव शक्तियों से बँधा हुआ मन क्यो नहीं माना जाता ? तो इस पर यह उक्ति विवेक करने…
- Verse 12यदि कोई कहे कि समुदाय किसी समुदायकर्ता अन्य के लिए ही होता है, ऐसा नियम है, अतः यहाँ पर भ…
- Verse 13अच्छा, चेतन जीव इसका अधिष्ठाता हो, वह चित्तरूप लगाम के बिना इन्द्रियरूपी घोड़ों को काबू म…
- Verse 14अपने से कल्पित मन से जिनकी परमार्थ दृष्टि जल गयी है, उन लोगों की दुःख परम्परा को देखकर मे…
- Verse 15जिस दुःख का कोई निमित्त होता है, उस दुःख का, निमित्त के निवारण से, निवारण किया जा सकता है…
- Verse 16निरन्तर पैदा होनेवाले जड, पापी, दुर्बुद्धि सागर से बुद्बुदों की तरह विनाश के लिए ही विविध…
- Verse 17देखिये, प्रत्येक देश में प्रतिदिन पशु हिंसा स्थान में नियुक्त लोगों द्वारा कितने पशु मारे…
- Verse 18भूमि में उत्पन्न होनेवाले जीवों में से डाँसों और मच्छरों का प्रतिदिन वायु संहार कर डालता…
- Verse 19प्रत्येक दिशा में हर एक वन में बड़े-बड़े पर्वतों पर शबर आदि लाखों मृगों को मारते हैं, इसम…
- Verse 20निर्दय बड़ी मछली जल में छोटे छोटे अनेक अनेक जलजीवों को अपने आहार के लिए काटती है। इसमें क…
- Verses 21–31अब बलवानों द्वारा दुर्बलो के पीडन का परम्परा द्वारा उपपादन करते हैं। भूखी मक्खी परमाणु कण…
- Verses 32–36प्रत्येक दिशा में प्राणियों के शरीरो में भी कीड़े, जुएँ आदि विचित्र जीव पैदा होते हैं, वृ…
- Verse 37इस प्रकार असंख्य जन्मों ओर मरणों में करूणावान लोग सदा प्रसन्न होवें चाहे रोएँ । किन्तु इस…
- Verse 38संसार में पशु-पक्षी सरीखे लोगों को उपदेश देना उचित नहीं है । भला वन में ठ के निकट कथा का…
- Verses 39–41जिन्होंने अपने मन को विषयों में फैला रक्खा है, उन मनुष्यों और पशुओं में क्या अंतर है ? पश…
- Verses 42–43हे श्रीरघुनन्दन, जिन लोगों ने अपने चित्त पर विजय प्राप्त कर ली है उनके दुःख को दूर करना स…
- Verse 44प्रसंग प्राप्त अधिकारी विचार को समाप्त कर प्रस्तुत विषय का ही अनुसरण करते हुए कहते है । ह…
- Verse 45हे शत्रुनाशन, इस समय आप परमार्थ आत्मरूप को जान चुके हैँ । संकल्प से चित्त की अभिवृद्धि हो…
- Verse 46अव बन्ध और मोक्ष का रहस्य कहते हैं। यदि आप इस दृश्य का अवलम्बन करते हैं, तो आप चित्त युक्…
- Verse 47यदि कोई प्रश्न करे, यह दृश्यतत्त्व क्या है, तो इस पर कहते हैं। इस त्रिगुणात्मक मायामय प्र…
- Verses 48–49“अहम् यानी आन्तरदृश्य ओर “इदम् यानी बाह्य दृश्य है ही नहीं, इस प्रकार ध्यान कर रहे, अनन…
- Verse 50यदि कोई कहे, उन दोनो का कलना का त्याग करने पर कौन वस्तु अवशिष्ट रहती है, जिसमें आप स्थिति…
- Verse 51चाक्षुष त्रिपुटी की भति आसन आदि ब्रुटियों में भी उस साक्षी का ही ध्यान करना चाहिये, ऐसा क…
- Verses 52–56अनुमति आदि अन्य अनुभवों में भी ऐसा ही समझना चाहिये, इस आशय से कहते हैं। हे श्रीरामचन्द्रज…
- Verses 57–58कैसे चेत्य की ओर जीव गिरता है, उससे कैसे संकल्पो को प्राप्त होता है और कैसे संकल्प का क्ष…
- Verses 59–61यह सम्पूर्ण जगत आत्मा ही है, अन्दर ऐसे ज्ञान का उदय होने पर उपहित चित्तता कहाँ है ? उपाधि…
- Verses 62–63मनोनाश के उपाय का उपसंहार करते हैं। परमार्थ तत्त्व का ज्ञान होने से यह जगत आत्मा ही है, ऐ…
- Verses 64–65हे अनघ, यह अतिबलवान चित्तरूप वेताल एकमात्र भ्रान्ति से उत्पन्न हुआ है, सम्यकृज्ञानरूपी मन…
- Verse 66आत्मलाभ से सब कामनाओं की प्राप्ति होने पर रागरहित अतएव बाह्य सुखों के साधनों के उपार्जन स…