Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 14, Verse 37
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 14, verse 37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
यः प्रवृत्तः कुबुद्धीनां दयावान्दुःखमार्जने ।
स्वगतच्छत्रनिर्मृष्टसूर्यांशु खिद्यते नभः ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार असंख्य जन्मों ओर मरणों में करूणावान लोग सदा
प्रसन्न होवें चाहे रोएँ । किन्तु इस संसाररूपी भ्रम में, जिसमें निरन्तर मृत्यु और निरन्तर उत्पत्ति है, न
तो प्रसन्नता उचित है, न तो दुःखिता ही उचित है। भाव यह कि द्वेष न होने के कारण दूसरे की पीड़ा के
अभिनन्दन की तरह स्नेह न होने के कारण दूसरे की पीड़ा के लिए रोदन भी ठीक नहीं है, किन्तु उपेक्षा
ही उचित है। इस प्रकार प्राणियों की प्रचुर जन्मवाली ये पंक्तियाँ वृक्ष के पत्तों के तुल्य व्यर्थ ही उत्पन्न
हो-होकर लीन हो जाती हैं ॥ ३ ४-३६॥ जो पुरुष दयालु बनकर कुबुद्धि लोगों के दुःख को दूर करने के
लिए प्रवृत्त हुआ, वह सारे आकाश को अपने छाते से तापरहित करने के लिए परीश्रम करता है यानी
कुबुद्धियों के दुःख को दूर करना अपने ऊपर ताने हुए छाते से सारे आकाश के ताप को दूर करने की
तरह असम्भव है