Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 14, Verse 66
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 14, verse 66 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 66
संस्कृत श्लोक
नीराग एव निरुपार्जन एव चास्मीत्येतावतैव गलिता तव चित्तसत्ता ।
निर्दुःखमुत्तमपदं परमं गतोऽसि तिष्ठोपशान्तपरमैषण एवमन्तः ॥ ६६ ॥
हिन्दी अर्थ
आत्मलाभ से सब कामनाओं की प्राप्ति होने पर रागरहित
अतएव बाह्य सुखों के साधनों के उपार्जन से हीन ही मैं हूँ, केवल इतने से ही आपकी चित्तसत्ता
नष्ट हो गई है आप दुःखरहित उत्तम परमपद को प्राप्त हो गये हैं, इस प्रकार मुमुक्षा भी जिसके
अन्तःकरण में शान्त हो गई ऐसे आप स्थित होईये