Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 14, Verse 14
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 14, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
मनोनिर्दग्धदृष्टीनां दृष्ट्वा दुःखपरम्पराम् ।
मतिर्मे करुणाक्रान्ता राम मुग्धेव तप्यते ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
अपने से कल्पित मन से जिनकी परमार्थ दृष्टि जल गयी है, उन लोगों
की दुःख परम्परा को देखकर मेरी करुणा से सराबोर मति मानो व्यामोह (घबराहट) को प्राप्त हो जाती
है क्योकि उनकी दुःखनिवृत्ति का उपाय खोजने पर करोड़ों वर्षो में भी नहीं मिल सकता