Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 14, Verses 64–65
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 14, verses 64–65 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 64,65
संस्कृत श्लोक
भ्रान्तिमात्रोत्थितश्चित्ते वेतालोऽतिबलोऽनघ ।
सम्यग्ज्ञानेन मन्त्रेण प्रसभं विनिपात्यताम् ॥ ६४ ॥
देहगेहाद्गते चित्तयक्षे बलवतां वरे ।
निराधिर्विगतोद्वेगस्तिष्ठ नास्ति भयं तव ॥ ६५ ॥
हिन्दी अर्थ
हे अनघ, यह अतिबलवान चित्तरूप वेताल एकमात्र भ्रान्ति से
उत्पन्न हुआ है, सम्यकृज्ञानरूपी मन्त्र से उसका जबरदस्ती विनाश कर डालिये । देहरूपी घर के
बलवान में श्रेष्ठ चित्तरूप यक्ष के चले जाने पर आप मानसचिन्ताशून्य और व्याकुलतारहित होइये,
आपको कोई भय नहीं है