Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 14, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 14, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
ज्ञः पश्यति सदैवात्मा स्पन्दने प्राणशक्तयः ।
इन्द्रियाणि स्वधर्मेषु मनो राम किमुच्यते ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
"वस्तुतो यन्न विद्यते“ एसा जो पहले कहा, उसकी उपपत्ति कहते है ।
ज्ञानी आत्मा सदा ही देखता है, स्पन्द में प्राण -शक्तियाँ समर्थ हैं, इन्द्र्यो अपने धर्मो में समर्थ
हैं; हे श्रीरामचन्द्रजी, भला मन नामक वस्तु क्या कही जाती हे । भाव यह कि क्या पदार्थो की प्रसिद्धि के
लिए मन माना जाता है अथवा स्पन्द के लिए या ज्ञानेन्द्रिय ओर कर्मेन्द्रिय के प्रयोजन की सिद्धि के
लिए ? प्राणप्रेरित इन्द्रियों से समीप में लाये गये पदार्थो की प्रसिद्धि साक्षी से ही हो सकती है, इसलिए
मन का कोई प्रयोजन नहीं हे