Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 14, Verses 42–43
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 14, verses 42–43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
विनिर्जितात्मचित्तानां दुःखानि रघुनन्दन ।
सुविचार्याणि तेनात्र ज्ञातज्ञेयः प्रवर्तताम् ॥ ४२ ॥
मनो नास्ति महाबाहो मा मुधोप प्रकल्पय ।
अनेन कल्पितेन त्वं वेतालेनेव हन्यसे ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरघुनन्दन, जिन लोगों ने अपने चित्त पर विजय प्राप्त
कर ली है उनके दुःख को दूर करना सरल है, इसलिए ज्ञानी पुरुष दुःख मार्जन में प्रवृत्त हो