Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 14, Verses 1–2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 14, verses 1–2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 1, 2
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
संसारसागरासारकल्लोलैरुह्यमानया ।
मतेर्मानद मूकत्वं यया जनतयार्जितम् ॥ १ ॥
आत्मलाभमयोदारकलाभिरिह सा मया ।
विचारोक्तिभिरेताभिः शास्त्रेऽस्मिन्नोपदिश्यते ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
मन एवाऽसदुत्थितम्। यःशक्तो न वशीकर्तु नाऽसौ रामोपदिश्यते। इस प्रकार पहले प्रस्तुत उपदेश
के अनधिकारीजनों का ही उपेक्ष्यरूप से वर्णन करते हैं।
हे मान देनेवाले श्रीरामचन्द्रजी, संसाररूप सागर के निःसार कल्लोलरूप विषयसुखाभिलाषाओं
से निरन्तर कर्म में प्रवृत्त की जा रही जिस जनता ने मन के निग्रह, विवेक, वैराम्य आदिके विषय में
अपेक्षा न होने से विद्वानों को पाकर भी प्रश्न प्रार्थना आदि न कर मति की मूकता का ही अवलम्बन
किया, वह जनता मेरे द्वारा आत्म-लाभ के उपायों से भरे हुए, उत्कृष्ट-कला से युक्त इन विचार वचनं
से इस जगत में शास्त्र का उपदेश नहीं पा सकती
सर्ग सन्दर्भ
तेरहवाँ सर्ग समाप्त चौदहवाँ सर्ग विविध योनियों में दुःख पा रहे, उपदेश के अयोग्य लोगों की उपेक्षा कर उपदेश के योग्य लोगों के लिए मन के मार्जन के उपाय का वर्णन ।