Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 14, Verses 59–61
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 14, verses 59–61 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 59-61
संस्कृत श्लोक
अहमात्मेति जीवोऽस्मीत्येतावच्चित्तकं विदुः ।
अनेनेत्थमनाद्यन्तं दुःखं राघव तन्यते ॥ ५९ ॥
अहमात्मा न जीवाख्याः सत्ताः सन्तीतराः क्वचित् ।
इत्येव चित्तोपशमः परमं सुखमुच्यते ॥ ६० ॥
आत्मैवेदं जगदिति जाते राघव निश्चये ।
असत्ता चेतसो जाता भवत्येव न संशयः ॥ ६१ ॥
हिन्दी अर्थ
यह सम्पूर्ण जगत आत्मा ही है, अन्दर ऐसे ज्ञान का उदय होने पर उपहित चित्तता
कहाँ है ? उपाधिरूप चित्त कहाँ है ? चित्तवृत्ति से व्याप्त चेत्य कहाँ है और चित्त वृत्ति कहाँ है ? अर्थात्
कुछ भी शेष नहीं रहते हैं ॥५ ८॥ हे श्रीरामचन्द्रजी, मैं आत्मा हूँ, इस प्रकार अनुभव में आ रहे देह इन्द्रिय
आदि से युक्त जीव हूँ, केवल इतना ही तुच्छ चित्त है, यह इस प्रकार अनादि ओर अनन्त दुःख का
विस्तार करता है । मैं ब्रह्म ही हूँ, ब्रह्म से अतिरिक्त जीव नामक परमार्थ सत् कुछ कहीं नही हैं । यही
चित्त का विनाश है, इसीको परमसुख कहते हैं। हे श्रीरामचन्द्रजी, आत्मा ही यह जगत है, ऐसा निश्चय
होने पर चित्त की असत्ता अर्थतः सम्पन्न हो जाती है, इसमें कोई संदेह नहीं हे