Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 57
छप्पनवाँ सर्ग समाप्त सत्तावनवाँ सर्ग श्रीरामचन्द्रजी के प्रश्न का अनवसर, वासना के त्याग का क्रम और एकमात्र वासनात्याग से प्रसिद्ध हुए लोगों की प्रशंसा ।
30 verse-groups
- Verse 1आगे के जानेवाले प्रश्न की इच्छावाले श्रीरामचन्द्रजी श्रीवसिष्ठजी द्वारा कही गई पूर्वोक्त…
- Verses 2–3सबके नियन्ता, सर्वव्यापक, चिन्मात्र, निर्मलपद, जैसे पृथिवी में जरायुज, उद्भिज आदि चार प्र…
- Verses 4–5परमात्मा के भोक्तृत्व ओर अभोक्तरत्व के अविरोध में भी उपपत्ति कृत्व ओर अकर्तृत्व के अविरोध…
- Verses 6–29प्रश्न में उपयोगी होने के कारण पूर्वस्य में कही गई जगत की सत्ता ओर असत्तारूप दृष्टि के पक…
- Verse 30देखी, आत्मा के प्रति लगन नहीं देखी, ऐसा कहते हैं। यहाँ पर जो कुछ दिखाई देता है, वह इष्ट ओ…
- Verse 31अनात्मा में प्रयत्न एकमात्र अनात्म देह के लिए ही है, अतएव वह पुनः पुनः देह प्राप्ति रूप अ…
- Verse 32पाताल में, ब्रह्मलोक में, स्वर्ग में, पृथिवी पर और अन्तरिक्ष में जिन्हें चिदेकरस का परिज्…
- Verses 33–34यह हेय है, यह उपादेय है, इस प्रकार अज्ञान से उत्पन्न हुए निश्चय जिस ज्ञानी के नष्ट हो गये…
- Verse 35यदि कोई शंका करे कि संसार में उत्तम राज्यादि पद प्राप्त करने पर भी शान्ति दिखाई देती है फ…
- Verse 36उनकी उपासना से तत्त्वज्ञान होने पर भी फिर भोगो में अनुराग का निवारण कौन करेगा ? इस शंका प…
- Verse 37तब भूत भी तो बहुत हैं, बचे हुए भूतों के भी अनन्त होने से उनसे उद्धार पाना संभव नहीं है। ऐ…
- Verse 38अपरिच्छिन्न आत्मानन्द की दृष्टि में ब्रह्माण्ड कदम्ब गोलक के तुल्य है। इस सारे ब्रह्माण्ड…
- Verse 39राज्यादि सुख युद्ध आदि अनर्थो द्वारा लाखो योद्धाओं के क्षय का कारण होता है, इसलिए दयालू त…
- Verse 40यदि कोई शंका करे कि महाकल्प तक चिरकाल भोगने योग्य ब्रह्मा के पद में (हिरण्यगर्भपद में) :…
- Verse 41तत्त्वज्ञानी आत्मा की दृष्टि से तो तीनों जगत सृष्टि आदि से तनिक भी उत्पन्न नहीं हुए, क्यो…
- Verse 42असार अंश के अधिक होने से ओर उपयुक्त अंश के न्यून होने से भी सार्वभौम आदि पद स्युहणीय नहीं…
- Verse 43पाताल और स्वर्ग सहित इस जगत में वह कार्य नहीं है, जो कि आत्मज्ञानी पुरुष को अवश्य कर्तव्य…
- Verses 44–45जैसे मृग तृष्णा सूर्य के प्रकाश से उत्पन्न होती है, अतएव सूर्य की अपेक्षा करती है, किन्तु…
- Verses 46–47जगत को तत्त्वज्ञानी के आत्मप्रकाश की अपेक्षा है, इस बात को विस्तार से स्पष्ट करते हैं। सभ…
- Verse 48अधिष्ठानरूप से आत्मप्रकाश की अपेक्षा कह कर जड़ पदार्थो के प्रकाश के लिए भी उसकी अपेक्षा ह…
- Verse 49*एतस्यैवानन्दस्वान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति” इस श्रुति से सब प्राणियों के जीवन के हेत…
- Verse 50मृगो को वनविहार में स्वातन्त्रय है, किन्तु देहरूपी पिंजडे में वेधे रहने के कारण नर्, चुर…
- Verse 51इस प्रकार संसाररूपी देह के विवेक से शून्य, वनपंक्तियों की मृगरूपी मांस की पुतलियाँ, जिनके…
- Verse 52तत्त्वज्ञानी की भी देह देखी जाती है, अतएव वह भी क्या वैसा ही है, इस पर नहीं ऐसा कहते हैं।…
- Verse 53हे श्रीरामचन्द्रजी, जिसमें चन्द्र और सूर्य के संचार का प्रदेश आकाश विपुल होता हुआ भी पृथ्…
- Verse 54जिस तत्त्ववेत्ता के चित्प्रकाश से ब्रह्मा आदि लोकपाल प्रकाशवाले होकर एवं चक्षु द्वारा बाह…
- Verse 55तत्त्वज्ञ पुरुष को, वैराग्य के दृढ़ होने के कारण भोगवासना का क्षय होने से जिसका अन्तःकरण…
- Verse 56जैसे भगवती पार्वतीजी के नृत्य की इच्छा करनेवाले भगवान शंकर को नाचते हुए बन्दर अनुरंजित नह…
- Verse 57जैसे घडे से बाहर रहने की अवस्था में रत्न के भीतर दिखाई दे रही स्तम्भ, दीवार आदि के प्रतिब…
- Verse 58पूवोक्त अर्थ का ही संक्षेप से उपसंहार करते है । जैसे राजहंस बगुले के खाने योग्य गन्दे शेव…