Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 57, Verse 31
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 57, verse 31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
ये केचन समारम्भा ये जनस्य क्रियाक्रमाः ।
ते सर्वे देहमात्रार्थमात्मार्थं नतु किंचन ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
अनात्मा में प्रयत्न एकमात्र अनात्म देह के लिए ही है, अतएव वह पुनः पुनः देह प्राप्ति रूप अनर्थ
का हेतु है, इस आशय से कहते हैं।
मनुष्यों के जो कोई लौकिक गृह, महल आदि के निर्माण कार्य हैं और जो वैदिक यज्ञादि क्रियाएँ हैं,
वे सब एकमात्र देह के लिए हैं, आत्मा के लिए उन का कोई भी उपयोग नहीं है