Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 57, Verse 42

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 57, verse 42 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 42

संस्कृत श्लोक

इतः शैलशतैर्व्याप्ता तथेतो जलराशिभिः । कियानस्य भुवो देहो येनोदारं प्रपूरयेत् ॥ ४२ ॥

हिन्दी अर्थ

असार अंश के अधिक होने से ओर उपयुक्त अंश के न्यून होने से भी सार्वभौम आदि पद स्युहणीय नहीं है, इस आशय से कहते हैँ । यह पृथ्वी इधर सैकड़ों पर्वतां से व्याप्त हे एवं इस तरफ अनन्त जल राशियों से व्याप्त हे । इस पृथ्वी का शरीर ही कितना बड़ा है, जिससे कि वह सबके त्याग से रिक्त हुए उस ज्ञानी के विशाल आशय को पूर्ण कर सके। भाव यह है कि भूमि सर्वाश उपयोग में नहीं आ सकती, इसलिए भी सार्वभौमिपद स्पृहणीय नहीं हो सकता