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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 57, Verse 52

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 57, verse 52 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 52

संस्कृत श्लोक

नैवंविधोदारमना मनागपि महामतिः । न ज्ञश्चलति भोगौधैर्मन्दवातैरिवाचलः ॥ ५२ ॥

हिन्दी अर्थ

तत्त्वज्ञानी की भी देह देखी जाती है, अतएव वह भी क्या वैसा ही है, इस पर नहीं ऐसा कहते हैं। सर्वत्यागी पूर्वोक्त महामतिवाला तत्त्वज्ञ पुरुष तनिक भी इस प्रकार का नहीं है। जैसे पर्वत मन्दवायु से विचलित नहीं होता वैसे ही भोगो के समूह से तत्त्वज्ञानी विचलित नहीं होता