Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 57, Verse 36
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 57, verse 36 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
सर्वत्र पञ्चभूतानि षष्ठं किंचिन्न विद्यते ।
पाताले भूतले स्वर्गे रतिमेतु क्व धीरधीः ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
उनकी उपासना से तत्त्वज्ञान होने पर भी फिर भोगो में अनुराग का निवारण कौन करेगा ? इस
शंका पर कहते हैं।
सर्वत्र पाँच भूत हे, छठा कुछ भी नहीं है, इसलिए कौन धीरबुद्धि पुरुष पाताल में, पृथिवी में और
स्वर्ग मे रति को प्राप्त होगा । भाव यह है “अपागादग्नेरग्नित्वं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम्” इस श्रुति में
कही गयी रीति से सब भौतिक पदार्थों के भूतमात्रतारूप मिथ्यात्व का बोध होने पर उनमें अनुराग का
उदय ही नहीं होता