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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 57, Verses 44–45

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 57, verses 44–45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 44,45

संस्कृत श्लोक

एकतामनुयातस्य व्योमवद्विततस्य च । स्वस्थस्यात्मवतो ज्ञस्य स्थितस्यात्मन्यचेतसः ॥ ४४ ॥ शरीरजालनीहारधूसरा शून्यकोटरा । शान्तसंसारसुभगा त्रिलोकीविपुलातटी ॥ ४५ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे मृग तृष्णा सूर्य के प्रकाश से उत्पन्न होती है, अतएव सूर्य की अपेक्षा करती है, किन्तु सूर्य मृगतृष्णा का निमित्त होता हुआ भी उसकी अपेक्षा नहीं करता है वैसे ही तत्त्वज्ञानी के चित्प्रकाश से उत्पन्न हुआ जगत ही तत्त्वज्ञानी की अपेक्षा करे, तत्त्वज्ञानी तो पूणनिन्द में समता है, अतएव कटाक्ष से भी जगत को नहीं देखता, जगत की अपेक्षा करना तो उसके लिए बहुत दूर है, ऐसा कहते है । एकता प्राप्त हुए, आकाश के समान सब जगह व्याप्त, स्वस्थ, आत्मज्ञानी, आत्मनिष्ठ, मनरहित पुरुष का त्रिलोकीरूपी विशाल मृगतृष्णानदी का तट निवृत्त हुए सारे संसार से सुन्दर होकर आकाश के मध्य भाग के तुल्य ही मूर्तस्वरूपवाला नहीं है, यद्यपि शरीर आदि असत्‌ हैं, फिर भी बाधित पदार्थो की अनुवृत्ति से प्रारब्ध कर्मो का नाश होने तक उनका आभास होता ही है; अतएव उक्त त्रिलोकी रूपी मृगतृष्णा नदी का तट शरीर समूहरूपी कुहरे से धूसर रग का हे