Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 57, Verse 53
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 57, verse 53 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 53
संस्कृत श्लोक
तस्मिन्किल पदे राम ज्ञस्तिष्ठति महोत्तमे ।
यस्मिंश्चन्द्रार्कदेशोऽपि न पातालमिव स्थितः ॥ ५३ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी,
जिसमें चन्द्र और सूर्य के संचार का प्रदेश आकाश विपुल होता हुआ भी पृथ्वी के छिद्र के समान
अल्परूप से भी स्थित नहीं है, उस महान पद में ज्ञानी स्थित होता है। भाव यह है कि उस प्रकार के
महापद में स्थित हुए ज्ञानी की आकाश के मध्य के देश से परिच्छिन्न पदों में कैसे लगन हो सकती
है ?