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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 57, Verse 49

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 57, verse 49 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 49

संस्कृत श्लोक

विहरन्ति स्वमात्मानः संसारवनचारिणः । कामभोगोलपग्रासमृगा नरसुरासुराः ॥ ४९ ॥

हिन्दी अर्थ

*एतस्यैवानन्दस्वान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति” इस श्रुति से सब प्राणियों के जीवन के हेतु विषयानन्द के लिए भी उसकी अपेक्षा है, ऐसा कहते हैं। देहरूप से जो परिच्छन्न होता है या अनुभूत होता है या नष्ट होता है, ऐसे आत्मावाले पुरुष, नर और असुर, जो संसाररूपी वन में विहार करनेवाले तथा काम भोगरूप तृणों के ग्रास में मृग के समान हैं, आनन्दपूर्वक विहार करते हैं