Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 57, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 57, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
सत्यमेतत्त्वया ब्रह्मन्यदुक्तं सूक्तिसुन्दरम् ।
अकर्तैव हि कर्तात्मा भोक्ताभोक्तैव भूतकृत् ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
आगे के जानेवाले प्रश्न की इच्छावाले श्रीरामचन्द्रजी श्रीवसिष्ठजी द्वारा कही गई पूर्वोक्त बातों
के अनुवाद और प्रशसा द्वारा उनका मुझे बोध हो गया यों दशति हैं।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे भगवन्, सदुक्तियों से सुन्दर जो आपने पहले कहा, यह वास्तव में ठीक
हे । भूतो का निर्माण करनेवाले परमात्मा अकर्ता होते हुए भी कर्ता हैं और अभोक्ता होते हुए भी भोक्ता
हैं। यद्यपि आपने परमात्मा की सर्वभोक्तृता ओर अभोक्तृता नहीं कही, तथापि अकर्तृता ओर सर्वकर्तृता
के समान मैंने उसे भी जान लिया
सर्ग सन्दर्भ
छप्पनवाँ सर्ग समाप्त सत्तावनवाँ सर्ग श्रीरामचन्द्रजी के प्रश्न का अनवसर, वासना के त्याग का क्रम और एकमात्र वासनात्याग से प्रसिद्ध हुए लोगों की प्रशंसा ।