Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 57, Verses 4–5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 57, verses 4–5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 4,5
संस्कृत श्लोक
औदासीन्यादनिच्छत्वान्न भुङ्क्ते न करोति च ।
समग्रालोककारित्वाद्भुंक्ते देवः करोति च ॥ ४ ॥
किंत्वयं भगवन्स्फारः संशयो मे हृदि स्थितः ।
तं त्वं छिन्धि गिरा ब्रह्मन्दीधित्येन्दुर्यथा तमः ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
परमात्मा के भोक्तृत्व ओर अभोक्तरत्व के अविरोध में भी उपपत्ति कृत्व ओर अकर्तृत्व के अविरोध
में कही गई उपपत्ति के तुल्य ही है ऐसा मैंने जान लिया, यह दशति है।
परमात्मा उदासीन और इच्छारहित होने के कारण न भोगकर्ता है ओ न सृष्टिकर्ता हे । सम्पूर्ण
लोकों का प्रकाशक होने के कारण प्रकाश स्वरूप वह परमात्मा भोगकर्ता ओर सृष्टिकर्ता भी हे । किन्तु
हे ब्रह्मन्, मेरे हृदय में यह निम्नलिखित महान सन्देह है, जैसे चन्द्रमा अपनी किरणों से अन्धकार को
तहस-नहस कर देते हैं वैसे ही आप अपनी वाणी से इस सन्देह को छिन्न-भिन्न कर दीजिये