Guru's AddaGuru's Adda

Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 52

इक्यावनवाँ सर्ग समाप्त बावनवाँ सर्ग संकल्प से कल्पित विश्व मिथ्या ही है यह सूचित करने की इच्छा से खोत्थराजा चरित की कल्पना करके वर्णन |

24 verse-groups

  1. Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, इसके बाद कभी आकाशमार्ग में स्थित और अदृश्यरूप…
  2. Verse 2हे सुबुद्धे, मेँ आकाश से, जिसका कि सप्तर्षिमण्डल एक भाग है निकलकर रात्रि में ऊँचे दाशूर क…
  3. Verse 3मैंने जंगल में शाखाओं के खोखले से मुकुलित कमलके अन्दर बैठे हुए भवर की ध्वनि के समान सम्पू…
  4. Verse 4हे महामते, हे पुत्र, सुनो, इस संसार की उपमानरूप इस एक आश्चर्यमयी आख्याकिया को मैं आपसे कह…
  5. Verse 5तीनों लोकों मे विख्यात महापराक्रमी एक राजा है । उसका नाम खोत्थ है, वह बड़ा समृद्धिशाली और…
  6. Verse 6सब लोकों में ब्रह्मा, विष्णु आदि सभी प्रभु जैसे धनी शिरोरत्न को सिर पर धारण करते हैं वैसे…
  7. Verse 7जो बड़े-बड़े साहसपूर्ण कार्य करने में एकमात्र रसिक है, विविध प्रकार के आश्चर्यमय स्थलों म…
  8. Verse 8जिसके सुख-दुःखप्रद हजारों कार्यों को सागर की तरंगों की तरह कौन गिन सकता है ?
  9. Verse 9जैसे कोई पुरुष मुड्ठी से आकाश को पराजित नहीं कर सकता वैसे ही जिस महाबली के बल का न शस्त्र…
  10. Verse 10जिसकी लीला का, जो प्रयोजन थोड़ा होने पर भी हजारों कल्पनाओं से पूर्ण होने के कारण विशाल आर…
  11. Verse 11हे महाबाहो, उसके सब व्यवहाररूपी क्रीडा करने में सक्षम, उत्तम, मध्यम ओर अधम, सात्विक, राजस…
  12. Verse 12तीन शरीरवाला यह पक्षी के तुल्य अत्यन्त विशाल अव्याकृत आकाश में ही उत्पन्न हुआ है, वहीं पर…
  13. Verse 13उसी असीम आकाश में उसने ब्रह्माण्डरूपी नगर की, चौदह भुवन ही जिसके बड़े भारी रथों का समूह ह…
  14. Verses 14–15नन्दन आदि वन ओर उपवनों की पंक्तियों से वह पूर्ण है, मेरु आदि क्रीडाशैलों से सुशोभित है, म…
  15. Verse 16उसी अतिविशाल नगर में उक्त राजा ने विषयों के मोह में फँसे हुए, अपवरक (मध्यगृह) के समान आका…
  16. Verses 17–20कोई ऊपर रक्खे गये, कोई नीचे रक्खे गये और किन्‍्हीं को उसने बीच में नियोजित किया। कोई चिरक…
  17. Verse 21अहंकारों की सृष्टि करने के उपरान्त उन देव, मनुष्य आदि के देहसमूहों के व्यवहार करने पर संक…
  18. Verse 22हे पुत्र, तीन प्रकार के अनन्त शरीरों के अन्दर उन यक्षों के साथ लीलाओं द्वारा अस्वाधीनरूप…
  19. Verse 23हे वत्स, चंचल चित्तवाले उसकी कभी निश्चल इच्छा होती है कि अविद्यमान किसी स्वप्नादिजगद्रूप…
  20. Verse 24तदनन्तर वह भूताविष्ट की तरह निद्रा आदि के आवेश से जाग्रद्‌ देहादि के अभिमान का त्याग कर द…
  21. Verse 25हे पुत्र, चंचल चित्तवाले उसकी कभी संकल्प के लय की अवस्थारूप सुषप्ति को प्राप्त होऊँ, ऐसी…
  22. Verse 26फिर वह जल से तरंग के समान पूर्ण स्वभाव से ही तुरन्त फिर उत्पन्न हो जाता है। (क्योंकि वही…
  23. Verses 27–28फिर अपने ही व्यवहार से कभी उसका पराभव होता है, 'मैं किंकर हूँ, मैं अज्ञानी हूँ, “मे दुःखी…
  24. Verse 29हे पुत्र, अन्तर्गत आत्मज्योति से देदीप्यमान अतएव महामहिमाशाली वह राजा आँधी के झोंकों से अ…