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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 52, Verses 17–20

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 52, verses 17–20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 52 · श्लोक 17-20

संस्कृत श्लोक

ऊर्ध्वं केचिदधः केचित्केचिन्मध्ये नियोजिताः । केचिच्चिरेण नश्यन्त केचिच्छीघ्रविनाशिनः ॥ १७ ॥ असितच्छादनच्छन्ना नवद्वारविभूषिताः । अनारतवहद्वाता बहुवातायनान्विताः ॥ १८ ॥ दीपपञ्चकसालोकास्त्रिस्थूणाः शुक्लदारवः । मसृणालेपमृदवः प्रतोलीभुजसंकुलाः ॥ १९ ॥ मायया रचितास्तेन राज्ञा तेषु महात्मना । रक्षितारो महायक्षा नित्यमालोकभीरवः ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

कोई ऊपर रक्खे गये, कोई नीचे रक्खे गये और किन्‍्हीं को उसने बीच में नियोजित किया। कोई चिरकाल में नाश को प्राप्त होनेवाले हैं, तो कोई शीघ्र विनष्ट होनेवाले हैं । वे काले केशरूपी तृणों से आच्छादित और आँख, कान, नाक, मुँह आदि नौ द्वारों से अलंकृत हैं । उनमें निरन्तर वायु बहता रहता है, वे रोमकूपरूपी अनेक खिड़कियों से युक्त है और पाँच ज्ञानेन्द्रियरूपी पाँच दीपकों से वे प्रकाशयुक्त हैं । जघ और रीढ़ ही उनके तीन स्तम्भ है, सफेद हड्डियाँ भी बाँस के स्थानापन्न हैं, चिकनी मिट्ठी के स्थानापन्न चर्म से वे कोमल है, सड़करूपी बाहुओं से वे व्याप्त हैं। उस महात्मा राजा ने उन देह समूहों मेँ अभिमान द्वारा उनके रक्षक और स्वामीरूप अहंकारों की सृष्टि की। उक्त अहंकार आत्मविवेकरूपी प्रकाश से सदा भयभीत रहते हैं, क्योंकि उससे उनका विनाश हो जाता है