Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 52, Verses 27–28
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 52, verses 27–28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 52 · श्लोक 27,28
संस्कृत श्लोक
स्वयैव व्यवहृत्याथ कदाचित्परिभूयते ।
किंकरोस्म्यहमज्ञोऽस्मि दुःखितोऽस्मीति शोचति ॥ २७ ॥
मुदमेत्य कदाचिच्च स्वयमायाति दीनताम् ।
प्रावृड्वर्षकलोल्लासपूरादिव नदीरयः ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
फिर अपने ही व्यवहार से कभी उसका पराभव होता है, 'मैं किंकर
हूँ, मैं अज्ञानी हूँ, “मे दुःखी हूँ”, यों शोक करता है। कभी पूर्वानुभूत हर्ष का अतिक्रमण कर वर्षा ऋतु
की कला के उल्लास के प्रवाह का अतिक्रमण कर नदी के वेग के समान वह स्वयं दीनता को प्राप्त होता
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