Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 52, Verses 14–15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 52, verses 14–15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 52 · श्लोक 14,15
संस्कृत श्लोक
वनोपवनमालाढ्यं क्रीडाशिस्ररिसुन्दरम् ।
मुक्तालताविवलितवापीसप्तकभूषितम् ॥ १४ ॥
शीतलोष्णात्मकाक्षीणदीपद्वयविराजितम् ।
ऊर्ध्वाधोगतिरूपेण वणिङ्मार्गेण संकुलम् ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
नन्दन आदि वन ओर उपवनों की
पंक्तियों से वह पूर्ण है, मेरु आदि क्रीडाशैलों से सुशोभित है, मोतियों की लताओं से व्याप्त समुद्ररूपी
सात बावड़ियों से अलंकृत है, कभी न बुझनेवाले शीतल और उष्णरूप दो दीपकों से विराजमान है
तथा शास्त्रीय सत् कर्मों से ऊर्ध्वगति ओर अशास्त्रीय निन्दित कर्मों से अधोगतिरूप व्यापारी मार्गों से
वह भरा है