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Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 82

इक्यासीवाँ सर्ग समाप्त बयासीवाँ सर्ग प्रसन्न हुई कर्कटी का राजा और मन्त्री को मन्त्र देना ओर उनका समाधि से व्युत्थित हुई इसके लिए वध्य लोगों का भोजनरूप से अर्पण करना |

30 verse-groups

  1. Verses 1–3श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामचन्द्रजी, इस प्रकार राजा के मुख से सुनकर उस वन की बन्दरीरूपी…
  2. Verses 4–6राक्षसी ने कहा : अहो, आप दोनों की बुद्धि बड़ी पवित्र मालूम पड़ती है, जो कभी अस्त न हो ऐसे…
  3. Verses 7–8जैसे सूर्य की किरणों के संसर्ग से कमलों का विकास होता है और कुसुमों के संसर्ग से सुगन्धि…
  4. Verse 9मैंने भूमि के सूर्य के सदुश आप दोनों को इस जंगल में पाया है, आप दोनों पूजनीय हैं, इसलिए श…
  5. Verse 10राजा ने कहा : हे राक्षसकुलकानन की मंजरी, इस नगर में हृदयशूल सदा प्राणियों को अत्यन्त पीडा…
  6. Verses 11–12करने के लिए निकला हूँ, जब मनुष्यों के हृदय में शूलादि रोग ओषध द्वारा शान्त नहीं हुआ तब मै…
  7. Verses 13–15मूढ लोगों का विनाश करनेवाले तुम्हारे तुल्य व्यक्ति के निग्रह के लिए मेरी प्रवृत्ति हुई हे…
  8. Verse 16राजा ने कहा : हे प्रफुल्लित कमल के सदृश नेत्रवाली राक्षसी, दूसरे जीवों की देह से अपना जीव…
  9. Verses 17–19राक्षसी ने कहा : हे राजन्‌, हिमालय पर्वतमें छः मास के बाद समाधि से उठी हुई मुझे भोजन के स…
  10. Verse 20हे राजन्‌, अब मैं अपने शरीर के परित्याग तक प्राणियों की हत्या नहीं करूंगी, इसलिए मेरे इस…
  11. Verse 21राजन्‌, हिमालयनामक पर्वत है, जो शरत्काल की चाँदनी के समान शुभ्र है एवं उत्तर दिशा के मध्य…
  12. Verses 22–25पहले लोहे की मेघघटा के समान कर्कटी नामकी मैं उस पर्वतमें स्वर्ण शिखर के गुफारूपी घर में र…
  13. Verses 26–27उस मन्त्र को तुम लो, उससे लोक में सम्पूर्ण हृदयशूल शान्त हो जायेंगे, मेरे द्वारा की गई पी…
  14. Verse 28मारकर, रक्त ओर मांस को चूसकर जो बहुतसे लोग मैंने छोडे, रक्तसंचार से रहित नाडीवाले उन लोगो…
  15. Verses 29–31हे राजन्‌, यह विसूचिकामन्त्र तुमको प्राप्त हुआ ही समझो, क्योंकि सत्त्वयुक्त जो पुरुष हैं,…
  16. Verses 32–35वसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामचन्द्रजी, इस प्रकार उस रात्रि में राक्षसी, मन्त्री ओर राजा तीनों…
  17. Verses 36–38हे विशालशरीरवाली, तुम हमारी गुरू और सखी बन गई हो, इसलिए हे सुन्दरी, हम लोग तुम्हारे भोजन…
  18. Verses 39–40राक्षसी ने कहा : राजन्‌, मुग्धा युवती का रूपधारण करनेवाली मेरे लिए भोजन देने में आप समर्थ…
  19. Verses 41–42राजा ने कहा : हे अनिन्दिते, सोने के हारों से विभूषित स्त्रीका रूप धारण करनेवाली तुम मेरे…
  20. Verses 43–44तदनन्तर सैंकड़ों-हजारों पापियों, चोरों ओर दण्डनीयों को अपने राज्य से लाकर मैं तुम्हारा अन…
  21. Verses 45–47भोजनसे तृप्त होकर थोड़ी निद्रा लेकर फिर तुम समाधिस्थ हो जाओ। समाधि से व्युत्थित होकर फिर…
  22. Verse 48राक्षसी ने कहा : हे मित्र, तुमने बहुत ही युकितियुक्त कहा है, हे राजन्‌. मैं तुम्हारे कथना…
  23. Verse 49वसिष्ठजी ने कहा : हे रामचन्द्रजी, एेसा कहकर वह राक्षसी वहाँ पर सुन्दर स्त्री बन गई । उसने…
  24. Verses 50–51"हे राजन्‌, आओ चलँ", - ऐसा कहकर वह राक्षसी रात्रि में पहले चलने के लिए तैयार हुए उक्त राज…
  25. Verse 52प्रातःकाल होने पर वह राक्षसी सती-साध्वी स्त्रीकी लीला से अन्तःपुर में स्थित हुई और राजा ए…
  26. Verses 53–56मण्डल में से तथा दूसरे लोगों के नगरों से भी तीन हजार दण्डनीय लोगों को इकट्ठा कर दिया, उन्…
  27. Verse 57वहाँ सुखपूर्वक भोजन करके खूब तृप्त हुई तीन दिन तक लगातार सोकर जागरण से स्वस्थ हुई उसने फि…
  28. Verse 58वह पाँच या चार वर्षो में समाधि से जागृत होती थी ओर तदनन्तर समाधि से उठने के बाद फिर राजा…
  29. Verse 59वहाँ परस्पर विश्वासपूर्ण कथाएँ करती हुई कुछ काल तक रहकर उन वध्योंको लेकर फिर अपने स्थान ह…
  30. Verse 60वह राक्षसी आज भी पूर्वोक्त रीति से ही जीवन्मुक्त होने के कारण उसी हिमालय पर्वत के वनमें क…