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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 82, Verses 45–47

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 82, verses 45–47 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 82 · श्लोक 45-47

संस्कृत श्लोक

तृप्ता निद्रां मनाक्कृत्वा भव भूयः समाधिभाक् । समाधिविरता भूयोऽप्यागत्य पुनरन्यदा ॥ ४५ ॥ नेष्यस्यन्यान्वध्यजनान् हिंसा नैषां च धर्मतः । स्वधर्मेण च हित्वैव महाकरुणया समा ॥ ४६ ॥ त्वं समेष्यसि चावश्यं मां समाधिविरागिणी । असतामपि संरूढं सौहार्दं न निवर्तते ॥ ४७ ॥

हिन्दी अर्थ

भोजनसे तृप्त होकर थोड़ी निद्रा लेकर फिर तुम समाधिस्थ हो जाओ। समाधि से व्युत्थित होकर फिर आकर दूसरी बार अन्य वध्यजनों को ले जाओगी | धर्मतः इन लोगों की हिंसा हिंसा नहीं है, स्वधर्म से हिंसा ही इनके लिए महती कृपा के समान है । अवश्य तुम समाधि से उठकर मेरे पास आओगी, क्योकि असज्जनों की भी बढी हुई मित्रता निवृत्त नहीं होती