Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 82, Verses 36–38
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 82, verses 36–38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 82 · श्लोक 36-38
संस्कृत श्लोक
राजोवाच ।
गुरुस्त्वं नौ महादेहे वयस्या च सुनिर्वृता ।
निमन्त्रयावहे यत्नाद्ग्रासाय तव सुन्दरि ॥ ३६ ॥
न चास्मत्प्रणयं प्रीता वितथीकर्तुमर्हसि ।
सौहार्दं सुजनानां हि दर्शनादेव वर्धते ॥ ३७ ॥
लघुसौभाग्यसंयुक्तं कृत्वाकारं मनोरमम् ।
आगच्छास्मद्गृहं भद्रे तत्र तिष्ठ यथासुखम् ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
हे विशालशरीरवाली, तुम हमारी गुरू और सखी बन गई हो, इसलिए हे
सुन्दरी, हम लोग तुम्हारे भोजन के लिए यत्न से तुम्हें निमन्त्रित करते हैं । हमारे ऊपर प्रसन्न
हुई तुम हमारी बिनती को अस्वीकार करने के लिए योग्य नहीं हो, सज्जनों की मित्रता दर्शनसे
ही बढ़ती है। अत्यन्त सौभाग्ययुक्त और मनोहर छोटे आकार को बनाकर हे भद्रे, आप हमारे
घरमें आइए और वहाँ आनन्दपूर्वक रहिए