Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 82, Verses 50–51
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 82, verses 50–51 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 82 · श्लोक 50,51
संस्कृत श्लोक
राजन्नागच्छ गच्छाम इत्युक्त्वा भूपमन्त्रिणौ ।
अग्रे गन्तुं प्रवृत्तौ तौ रात्रावनुससार सा ॥ ५० ॥
अथ ते पार्थिवगृहं प्राप्य तां रजनीं मिथः ।
कथयैकगृहे रम्ये क्षपयामासुरादृताः ॥ ५१ ॥
हिन्दी अर्थ
"हे राजन्, आओ चलँ", - ऐसा कहकर वह राक्षसी रात्रि में पहले चलने के लिए तैयार हुए
उक्त राजा ओर मन्त्री के पीरछे-पीछे चली । इसके बाद राजा के महलमें पहुँचकर एक-दूसरे
के साथ आदर भाव रखनेवाले उन्होंने एक सुन्दर घर में बैठकर परस्पर कथा आदि से सारी
रात बिता दी