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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 82, Verse 48

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 82, verse 48 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 82 · श्लोक 48

संस्कृत श्लोक

राक्षस्युवाच । युक्तमुक्तं त्वया राजन्करोम्येवमहं सखे । सौहार्देन प्रवृत्तस्य को वाक्यं नाभिनन्दति ॥ ४८ ॥

हिन्दी अर्थ

राक्षसी ने कहा : हे मित्र, तुमने बहुत ही युकितियुक्त कहा है, हे राजन्‌. मैं तुम्हारे कथनानुसार ही करती हूँ। मित्रता से प्रवृत्त हुए पुरुष के वचनका कौन अभिनन्दन नही करता ?