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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 82, Verses 4–6

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 82, verses 4–6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 82 · श्लोक 4-6

संस्कृत श्लोक

राक्षस्युवाच । अहो बत पवित्रेयं भवतोर्भाति शेमुषी । अनस्तमितसारेण प्रबोधार्केण भासिता ॥ ४ ॥ शीता समरसा शुद्धा ज्योत्स्नेव शशिमण्डलात् । विवेककणिकां श्रुत्वा भवतो हृदयादियम् ॥ ५ ॥ विवेकिनो जगत्पूज्याः सेव्या मन्ये भवादृशाः । सत्सङ्गात्सविकासास्मि चन्द्रेणेव कुमुद्वती ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

राक्षसी ने कहा : अहो, आप दोनों की बुद्धि बड़ी पवित्र मालूम पड़ती है, जो कभी अस्त न हो ऐसे ज्ञानरूपी सूर्य से वह भासित हे जैसे चन्द्रमण्डल से निकली हुई चाँदनी शुद्ध, शीतल ओर समरस होती है वैसे ही यह मैं आप लोगों की बुद्धि से वाणी द्वारा निकली हुई विवेकामृत कणिकाको सुनकर शुद्ध शीतल ओर समरस हो गई हूँ, हे राजन्‌, आपके सदुश जो विवेकी पुरूष हैं, वे जगत्‌ के पूज्य है ओर सेवाकरने योग्य हैं, ऐसा मैं समझती हूँ, जैसे चन्द्रमासे कुमुदिनी विकसित होती है, वैसे ही मैं आप लोगों के सत्संग से विकसित हो गई हूँ ॥