Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 82, Verses 22–25
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 82, verses 22–25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 82 · श्लोक 22-25
संस्कृत श्लोक
तत्राहं निवसाम्यग्रे हेमशृङ्गदरीगृहे ।
आयसी मेघलेखेव कर्कटीनाम राक्षसी ॥ २२ ॥
तपसोपार्जितो ब्रह्मा जनतामारणेच्छया ।
विषूचिका प्राणहरा स्यां सूच्यात्मेति भो मया ॥ २३ ॥
तस्मात्संप्राप्तवरया बहून्वर्षगणान्मया ।
भुक्ता विषूचिकात्वेन जनता जीवबाधनैः ॥ २४ ॥
त्वया न गुणिनो हिंस्या इति मे ब्रह्मणा ततः ।
नियमार्थं महामन्त्रस्तदायत्तास्मि संस्थिता ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
पहले लोहे की मेघघटा के समान कर्कटी नामकी मैं उस पर्वतमें स्वर्ण शिखर
के गुफारूपी घर में रहती थी । मैंने जनता को मारने की इच्छा से जीवों के प्राणको हरनेवाली
सूचीरूपी विसूचिका होने के लिए ब्रह्माजी को तप से प्रसन्न किया । ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त
कर मैंने बहुत वर्षो तक विसूचिकारूप से जीवों को क्लेशप्रदान द्वारा जनताका विनाश किया ।
तब गुणी लोगों की हिंसा न करना", यो ब्रह्माजी ने गुणी लोगों की हिंसा न करने के लिए
महामन्त्र दिया । मैं उस मन्त्र के अधीन होकर स्थित हूँ