Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 82, Verses 53–56
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 82, verses 53–56 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 82 · श्लोक 53-56
संस्कृत श्लोक
ततो दिवसषट्केन संचितानि महीभृता ।
नृपः परपुरेभ्योऽपि स्वमण्डलगणात्तथा ॥ ५३ ॥
त्रीणि वध्यसहस्राणि तानि तस्यै तदा ददौ ।
सा बभूव निशा काले सैवोग्रा कृष्णराक्षसी ॥ ५४ ॥
तानि वध्यसहस्राणि जग्राह भुजमण्डले ।
धारानिकरजालानि मेघमालेव कोटरे ॥ ५५ ॥
ययौ राजानमापृच्छ्य तदेव हिमवच्छिरः ।
दरिद्रा लब्धहेमेव ग्रहेषूग्रशरीरिणी ॥ ५६ ॥
हिन्दी अर्थ
मण्डल में से तथा दूसरे लोगों के नगरों से भी तीन हजार दण्डनीय लोगों को इकट्ठा कर दिया,
उन्हें इकट्ठा करने के उपरान्त राजा ने वे सब उस राक्षसी को दे दिये । वह रात्रिम फिर वैसी ही
भयंकर काली राक्षसी बन गई । उन तीन हजार वध्यो को उसने अपने भुजमण्डल में ऐसे ग्रहण
किया जैसे कि मेघमाला अपने मध्यमे लटक रही धाराओं को ग्रहण करती हे । फिर जैसे कोई
दरिद्रा सुवर्ण को पाकर राजा से अनुमति लेकर चली जाती है, वैसे ही पूतना, राक्षस, पिशाच
आदि में बृहत्काय होने के कारण श्रेष्ठ वह राक्षसी राजा से अनुमति लेकर उसी हिमालय
शिखर पर चली गई