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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 82, Verses 13–15

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 82, verses 13–15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 82 · श्लोक 13-15

संस्कृत श्लोक

त्वादृशस्य च लोकस्य मुग्धलोकाभिघातिनः । निग्रहार्थं प्रवृत्तिर्मे सा च संपत्तिमेत्यलम् ॥ १३ ॥ एतावदेव च शुभे त्वयाङ्गीक्रियतां वचः । भूयो भवत्या प्राणा हि हिंसनीया न कस्यचित् ॥ १४ ॥ राक्षस्युवाच । बाढमेवं करोम्यद्यप्रभृत्यवितथं प्रभो । सत्यमेव न किंचिद्धि हिंसनीयं मयाधुना ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

मूढ लोगों का विनाश करनेवाले तुम्हारे तुल्य व्यक्ति के निग्रह के लिए मेरी प्रवृत्ति हुई हे । वह इस समय सर्वथा सम्पन्न हो गई हे । हे शुभे, तुम मेरा इतना ही वचन स्वीकार कर लो कि अब तुम किसीके भी प्राण न लेना । राक्षसी ने कहा : बहुत ठीक है, हे प्रभो, आजसे लेकर मैं निश्चित ऐसा ही करूंगी । मैं सच कहती हूँ, अब मेँ किसीकी हत्या नहीं करूंगी