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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 82, Verses 17–19

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 82, verses 17–19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 82 · श्लोक 17-19

संस्कृत श्लोक

राक्षस्युवाच । षड्भिर्मासैर्गिरौ राजन्प्रबुद्धायाः समाधितः । जाता भोजनसंकल्पाद्भोजनेच्छेयमद्य मे ॥ १७ ॥ इदानीं शिखरं गत्वा तदेव ध्याननिश्चला । यावदिच्छं सुखेनासे सजीवा शालभञ्जिका ॥ १८ ॥ आमृतीं धारणां बद्ध्वा धारयामि शरीरकम् । यथेच्छमथ कालेन त्यक्ष्यामीति मतिर्मम ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

राक्षसी ने कहा : हे राजन्‌, हिमालय पर्वतमें छः मास के बाद समाधि से उठी हुई मुझे भोजन के संकल्प से आज यह भोजनेच्छा हुई है । इस समय उसी शिखर पर जाकर, समाधि लगाकर अपनी इच्छानुसार सजीव प्रतिमा के समान मैं सुख से रहती हूँ । अमृतरूप आत्मा की भावनावाली समाधि लगाकर मैं अपने शरीर को इच्छानुसार जीवित रखती ह । उसके अनन्तर मैं अपने शरीर का त्याग करूंगी, ऐसा मेरा निश्चय है