Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 82, Verses 29–31
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 82, verses 29–31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 82 · श्लोक 29-31
संस्कृत श्लोक
राजन्विषूचिकामन्त्रः सोऽयं संपन्न एव ते ।
नहि सत्त्ववतामस्ति दुःसाध्यमिह किंचन ॥ २९ ॥
अतो दुर्नाडिकोशेषु शूलानां परिशान्तये ।
मन्त्रो यो ब्रह्मणा प्रोक्तो राजञ्शीघ्रं गृहाण तम् ॥ ३० ॥
आगच्छ निकटं नद्या गच्छामस्तत्र भूमिप ।
स्वाचान्ताभ्यां संयताभ्यां भवद्भ्यां सुमता ददे ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
हे राजन्, यह
विसूचिकामन्त्र तुमको प्राप्त हुआ ही समझो, क्योंकि सत्त्वयुक्त जो पुरुष हैं, उनके लिए कुछ
भी दुःसाध्य नहीं है । इसलिए हे राजन्, दुष्ट नाडियों के अन्दर शूलरोग की शान्तिके लिए
ब्रह्माजी ने जो मन्त्र कहा था, उसको आप शीघ्र ग्रहण कीजिए । हे राजन्, आओ नदी के
समीप चलें, वहाँ पर तुम्हारे ऊपर खूब प्रसन्न हुई मे आचमन कर पवित्र हुए तुम दोनों को
उक्त मन्त्र देती हूँ